Wednesday, February 17, 2010

furvury ki dhoop

क्या कोई ऐसी जगह है जहाँ फेब्रुअरी -- त्च त्च , नहीं , फरवरी की सर्दी की धुप खूबसूरत ना हो?

ऐसा लगता है जैसे महीनों किरणें सूरज से नाराज़ होने के बाद फिर से उसे मना रही हों। और सर्द हवा किरणों को धमका रही हो। किरणें की घबराहट ऐसे जैसे कोई लड़की infatuated होती है। पता नहीं सूरज हाथ थामता है या नहीं। सूरज भी अच्छी तरह test लेता है - फरवरी में तो सिर्फ आँख ही मिलाता है और यह प्यारी सी love story सर्दियों की धुप बन कर ज़मीन पर बरसती है।

आज बहुत देर तक अपने काम की बिल्डिंग की सीढीओं पर बैठ कर मैं इन्हें निहारती रही। Mind में आहिस्ता से ग़ुलाम अली की आवाज़ आने लगी --- दिल में इक लहर सी उठी है अभी/कोई ताज़ा हवा चली है अभी ... countenance छुपी नहीं तो एक co-worker ने भी निकलते हुए पूछ ही लिया, "wanna share?" मैंने कहा "join away" ... contagious फरवरी की धुप ने उसे भी infect कर दिया।

ऐसे भी दिन होते हैं जब सब कुछ एक poem बन जाता है और favorite lyrics कागज़ से निकल कर reality बन कर slow-dance करते हैं ...

फरवरी की सर्दिओं की धुप मैं
मूंदी मूंदी अखियों से देखना
हाथ की आढ़ से
निम्मी निम्मी ठंड और आग में
हौले हौले मारवा के राग में
मीर की बात हो

2 thoughts:

Rahul Vidwans said...

"Chup ke se lag ja gale raat ki chadar tale" isn't that this song?

Cool stuff to read, u have put in here. Furvury ki dhoop, me too have got a connection to it.

jasleen said...

Yeah Rahul- that is the song!

I love this stanza ... the imagery is brilliant and the "marwa ka raag" and the "mir" reference... :)