Saturday, December 11, 2010

चौखट by Rahul Vidwans

जाने क्यों
हसी मेरी, तुम्हारे साथ चले है अब भी
ना जाने क्यों खो जाऊ
और कदम तुम्हारा लहर उछाले अब भी

ना जाने क्यों
खुशबु तुम्हारी आए मेरे खून से
धड़कन क्यों न आजाद अब भी
तुम्हारी आँखों की कक्षा से

ना जाने क्यों
लगती हो बस तुम सच; धुंधला माहोल बाकी
और खुद भी धुंधला बैठा
उजागर न हूँ अब भी

ना जाने क्यों
दुनिया चतुर्थ मिती है, और मैं जीए हूँ तेरी आवाज में
पानी पिघल भीग जाए या हाथ तुम्हारा हाथ में

होटल टेबल के कोनो से टपकता मैं
और हवा में ठण्ड बन गुमसुम तुम
पता है फिर भी,
कोहरे में आजाद मेरा अपना सच - तुम

पर मैं अटका खडा अब भी उसी उथली चौखट में
ना जाने क्यों.


Direct Link: http://rahulvidwans.blogspot.com/2010/12/chaukhat.html

1 thoughts:

Rahul Vidwans said...

Mt honor Jasleen! Thank you very much!